डा0 राम प्रसाद बहुगुणा जी कि “ पुस्तक बहुगुण-वंश चरित ” 1991 के अनुसार
बहुगुणाऔं की प्रमुख बस्तियां-
प्रागैतिहासिक काल संवत् 980 से पन्द्रहवीं शताब्दि तक पांच छः सौ वर्षों में इस वंश के वशंज कहाँ रहे और कब किसने कौन सा गाँव बसाया ? इसका विवरण अभी दे पाना संभव नहीं है। हम इसे प्रागैतिहासिक काल ही कहेंगे। नागपुर, नीतिमार्ग, बड़ाहाट, जसपुर, सलाण तथा अल्मोड़ा की बस्तियों का सम्बन्ध इसी युग से है। गढ़ नरेश अजयपाल के राज्याभिषेक के एक वर्ष बाद 1501-02 ई0 में चम्पावत के राजा किरती चन्द्र ने उनको पराजित कीया तथा उसके उत्तराधिकारीयों के आक्रमण से चाँदपुर का दुर्भेदगढ़ खण्डर बन गया तो 1512 ई0 में अजयपाल ने देवलगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। परीणाम स्वरूप मन्त्रिगण तथा राजकर्मचारी भी चाँदपुर से उठकर देवलगढ़ के निकट आ बसे। बुधाणी, टकोली, पोखरी आदी गाँव बसने का यही इतिहास बताया जाता है। किंतु प्रस्तुत पंक्तियों का लेखक इस कथन को सर्वथा सत्य नहीं मानता। यदी 1512 ई0 में राजधानी के चांदपुर से उठकर देवलगढ़ बसने पर राजा के बहुगुण वंशी मन्त्री बुधाणी, पोखरी बसे तो पांच वर्ष बाद 1517 ई0 में देवलगढ़ से राजधानी के श्रीनगर चले जाने पर बुधाणी, पोखरी आदी गांव भी उजड़कर श्रीनगर-कीर्तिनगर के निकट बस जाने चाहिये थे, किंतु ऐसा नहीं हुआ। पोखरी के वंश विस्तार से पता चलता है कि ग्राम निश्चित ही बुधाणी से भी बहुत पहले बसा होगा। 1570 ई0 के आसपास यहाँ के वंशज अन्य क्षेत्रों में जाकर बसने लगे थे।
बुधाणी, टकोली, पोखरी तथा कोठार गाँवों से प्राप्त प्राचिन वंशावलीयों से पता चलता है कि अच्युतानन्द की चौथी पीढी में धागानन्द हुये। उनके सात पुत्र हुये जो किसी कारणवश (सम्भवतः परीवारिक कारणों) भिन्न- भिन्न स्थानों पर जाकर बसे। जैसे-
- केदा और केशा-बुधाणी में, जौका -टकोली में, द्युला-टेहरी साबली में स्यूला-भटवारी गये। भीमा-पालिगाँव बसे तथा पोथा-पोखरी गांव में आकर बसे।
- बुधाणी की वंशावली से पता चलता है कि केशा की चौथी पीढ़ी (अच्युतानन्द की आठवीं पीढी) में महादेव के तीसरे पुत्र सीधू (सिद्धानन्द) ईसा की सोलहवीं शताब्दि में राजा का धन वसूलने बलोड़ी गये और वहीं बस गये।
- बुधाणी से अच्युतानन्दजी की आठवीं पीढी में शशिधर जी के पुत्र कौडू 1750 ई0 लगभग झाला गाँव में जाकर बसे। ये लोग केशा की सन्तान हैं।
- बुधाणी से ही अच्युतानन्दजी की तेरहवीं पीढी में गुरूदासजी के पुत्र आशारामजी 1870 ई0 में ओडली गाँव में जाकर बसे। ये केदा की संतान हैं।
- बुधाणी से ब्रिटिश शासन में देश के बाहर गये हुये वंशजों में जाकार्ता (इन्डोनेशिया) स्थित स्वामी आदित्य (आदी बुगुना) प्रमुख हैं।
- पोखरी से 1567 ई0 में प्रयागु के पुत्र महाशर्मा टिहरी रियासत में साबली गावं जाकर बसे।
- पोखरी से गुणानन्द जी के पुत्र लीलानन्द ने 1803 ई0 में पौड़ी के निकट कोठार गांव बसाया।
- पोखरी से (प्रदीपशाह के शासनकाल 1715 से 1772 ई0) अठारहवीं शताब्दि में धीरजमणी काला, परिवार का पुरोहित बनकर सुमाड़ी बस गया। उन्नीसवीं शताब्दि में टकोली का एक परिवार भी इस गाँव में आ बसा। जगदगुरू रविदत्त, पं. भोलादत्त व ईश्वरी दत्त इसी शाखा से हैं। बीसवीं शताब्दि के प्रारम्भ में बुधाणी का एक परिवार इस गाँव में आकर दुकान करने लगा। कमांडेन्ट चन्द्रमोहन आदि इसि शाखा में है।
- पोखरी से राजपरिवार के साथ मेघाकर शास्त्री का परिवार श्रीनगर (श्रीकोट मौहल्ले) में बसा किंतु राजधानी के टिहरी स्थानान्तरित हो जाने पर 1815 ई0 में टिहरी चला गया। बाद में दो भाई टिहरी रह गये, शेष पोखरी लौट आये। श्रीनगर से भूधरमणि (पुत्र बंचीर) 1806 ई0 में थाती कठूड़ जाकर बसे। 1815 ई0 में सुदर्शन शाह द्वारा टिहरी में राजधानी बनाने पर प्रग्याकर जी के पुत्र रामदत्त व रमादत्त टिहरी में बसे। रामदत्त जी के पुत्र ज्वालादत्त दीवान हुये तथा रमादत्त के पुत्र नारायण दत्त, नुतनानंद आदी राज सहायक रहे हैं। मेघाकर जी के अनुज जयदेव के पुत्र धरणीधर धर्माचार्य के रूप में टिहरी जाकर लोस्तु में और बाद में खतवाड़ बस गये। कुछ काल बाद इस परिवार के वंशज देहरादून, ऋषिकेश आ गये। इधर साबली गांव से मकरंद के पुत्र बद्रीदत्त नागदत्त (अच्युतानन्दजी से सत्रहवीं पीढी में) 1815 ई0 में राजकर्मचारी बनकर टिहरी बस गये। चिपको आँदोलन के सूत्रधार व प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणाजी इसी शाखा में हैं।
- उन्नीसवीं शताब्दि के अन्त में पोखरी से सूर्यमणि के पुत्र चित्रामणि (अच्युतानन्दजी की पंद्रहवीं पीढी में) राज-कर्मचारी (पटवारी) के रूप में नंदप्रयाग में आकर बसे। गढ़केसरी अनसुइया प्रसाद इसी शाखा से है।
- 1859 ई0 में भवानंद के पुत्र केदारदत्त सुमाड़ी से दूध बेचने के उद्धेश्य से भैंस लेकर कर्णप्रयाग के निकट लंगासू व उत्तरों में आकर बसे।
- 1890 ई0 में साबली से शीशराम के पुत्र गंगाराम-टीकाराम (अच्युतानन्दजी की चौदहवीं पीढी में) दून क्षेत्र में तलाई (थानों) ग्राम में आकर बसे। इसके लेखक भी इसी वंशधारा में आते हैं। अब यहाँ से कुछ देहरादून के हर्बलपुर, छिदरवाला (श्यामपुर), रानीपोखरी एवं नकरोंदा जाकर बसे हैं।
- 1915-20 के बीच साबली से जीतराम के पुत्र (कनिष्टा पत्नी की संस्तति) नारायण दत्त, पातीराम ढेऊ (गडूर) में तथा गौरी दत्त के पुत्र रामानंद (अच्युतानन्दजी की चौदहवीं पीढी में) गडर (तलाई) आकर बसे। ये लोग सौड़ा, (बड़ासी) वालग्वाला घझुवाला तथा वाम्हनवाला जाकर बस गये हैं।
प्रो. शंभु प्रसाद जी के अनुसार केवलानन्द (केदा) ने 1490 ई. के लगभग बुधाणी गाँव को बसाया। यह समय देवलगढ़ में राजधानी आने तथा अजयपाल के राज्याभिषेक से भी लगभग यही होना चाहिये। पालिगांव तथा भटवाड़ी की वंशावलि प्राप्त न होने से इस कथन की सर्वथा पुष्टि न हो सकी। साबली गांव से प्राप्त होने वाली वंशावली के अनुसार उस गांव को बसाने वाले प्रथम बहुगुणा वंशज ज्योतिषराय उपाधि वाले प्रयागदेवाचार्य के पुत्र महाशर्मा हैं न कि द्यूला। संभव है कि द्यूला के वशंज टिहरी राज्य के किसी अन्य क्षेत्र में बसे होंगे या आज मात्र नामशेष हो गये होंगे। किंतु इन (बुधाणी, टकोली, पोखरी तथा कोठार की) वंशावली से यह स्पष्ट है कि बुधाणी में धागानन्द के केवल दो पुत्र केदा और केशा आये थे। शेष पांच पुत्र बुधाणी आये ही नहीं। इसी प्रकार धागानन्द के भाई-भतीजों की या चाचा ताऊ की सन्ततियां भी बुधाणी नहीं आई वरन् कहीं अन्यत्र बसी हैँ।
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