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परिचयः
उत्तराँचल, देवताऔं की भूमि, देव-भूमि, पचंबद्री, पचंकेदार एवं पचंप्रयागों की भूमि, जिसके कण-कण में देवताऔं का वास है, ऐसी देव-भूमि में बसा ओडली गाँव भौगौलिक दृष्टि से अंत्यन्त महत्वपूर्ण गाँव है। जहाँ कदम-कदम पर बिखरा है नैसर्गिक सौन्दर्य। जंहा बसंत की चमत्कृत कर देनें वाली खिली छटा और गर्मी के जोशीले उल्लास के बाद जब ऋतु परिपक्वता लेकर आती है और पेड़ों के पतौं का रंग जब सुनहरा हो जाता है तो प्रकृति की अद्भुत छटा व्यस्त जीवन के सारे तनावों को भुला कर अंत्यन्त सुकून देती है।
परिवारीक जानकारी के अनुसार “ओडली गाँव” हमारे पूर्वजों द्वारा डुंगरी गाँव की एक महिला से खरीदा गया था। डा0 राम प्रसाद बहुगुणा जी की पुस्तक “बहुगुण वंश चरित” के पृष्ठ संख्या 237 के अनुसार भी सन् 1870 ई0 में श्री अच्युतानन्द जी से 13 वीं पीढ़ी के श्री आशारामजी, बुघाणी गाँव से ओडली गाँव बसे। इसका एक प्रमाण सन0 1892 ई0 के Sh. T.F. Freeman, Ex. Asstt. Suptd., Survey of India द्वारा बनाये गये ओडली गाँव के नक्शे से भी मिलता है।
आशाराम जी की तीन सन्तानें क्रमशः रतीरामजी, शिवरामजी व जीवरामजी हुये, इन्ही तीनों भाइयों की सन्तानों का परिवार आज ओडली गाँव के रूप में एक विशाल वट वृक्ष की भांती अपनी शाखायें हर दिशा में फैला चुका है, जिसकी एक लम्बी श्रंखला है, अपने गौरवशाली, प्रतिभाशाली, दिवंगत एवं जीवंत लोगों की।
“ओडली गाँव” जो राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-121 (National Highway No. 121) पौड़ी - पाबौ - मुसागली - चिपलघाट - सांकरसैण - बेला - पौठाणी - थैलीसैंण मार्ग पर पौड़ी से अनुमानतः 36 की0 मी0 की दूरी पर बसा है तथा जिसका पोस्ट ऑफिस डुंगरीखाल, पट्टी बाली कन्डारस्यूं, विकास खण्ड पाबौ है। जिसके दक्षिण दिशा से कल-कल चपलता से इठलाती बहती निर्मल “पश्चिमी न्यार” (नदी) है जो दुधातोली से आ रही है तथा उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की तरफ एक छोटी न्यार (जिसको गाँव की भाषा में “ डुंगरी गदना” के नाम से जाना जाता है) आ रही है । जंहा पर इन दोनों नदियों का संगम होता है वंहा पर हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित एक अंत्यन्त प्राचीन देवाधिदेव महादेव का मन्दिर (शिवालय) है
तथा मन्दिर के ठीक नीचे नदी के तट पर हमारे पूर्वजों का अन्तिम निवास है जहाँ वे सदैव के लिये चिरनिन्द्रा में सो रहे हैं।
“ओडली गाँव ” पंहुचने के लिये “बेला बाजार” (जो कि 3-4 गाँवों का बाजार है) पर बस से उतरना पड़ता है। बेला बाजार से पहले सांकरसैण बाजार व गाँव आता है जहाँ पर इंटर कॉलेज भी है।
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बेला बाजार से 100-150 मी0 आगे एक छः फुटा जीप रोड़ है जो कि बेला से चौंरीखाल तक जाता है जिसकी दूरी लगभग 7-8 की0 मी0 की है। सरकारी उदासीनता के कारण एंव इस मार्ग का रख-रखाव न होने कि वजह से यह आज भी उबड़-खाबड़ पैदल रास्ता है। जब चौंरीखाल का जिक्र आता है तो बता दें यंहा पर इंटर कॉलेज और माँ काली का एक बहुत पुराना व एतिहासिक मन्दिर है एंव मार्गशीर्ष महीने में यंहा एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें आज भी पशु-बली प्रथा है। यंहा के बारे में प्रचलित है कि सच्चे ह्रदय से यंहा जो भी मांगा जाये वह मनोवांछित फल जरूर प्राप्त होता है। इसी रास्ते बेला से “पश्चिमी न्यार” पर बने लोहे के पुल द्वारा महादेव के मन्दिर तक पंहुचा जाता है जंहा पर दोनों नदीयों को संगम भी है, जिसका वर्णन उपर किया गया है, यंहा से एक कच्चा रास्ता ओडली गाँव व दूसरा रास्ता चौंरीखाल के लिये जाता है। गाँव की दूरी महादेव के मन्दिर से 100-150 मी0 है। यह महादेव का मन्दिर (शिवालय) लगभग 125-130 साल पुराना है और इसमें इतनें ही पुरानें बड़, पीपल, आम, अखरोट इत्यादि के पेड़ जो कि हमारे पूर्वजों द्वारा लगाये गये हैं, जब लहलाते हैं तो लगता है जैसे हमारे पूर्वज अपने परिवार की प्रगती को देखकर खुशी से झूम-झूम कर अपना आर्शीवाद दे रहे हों।
ओडली गाँव के आसपास डुंगरी, खण्डूली एंव नांदा इत्यादि पड़ोसी गाँव हैं। गाँव के ठीक नीचे दक्षिण दिशा में बड़े-बड़े खेत हैं जो कल-कल बहती पश्चिमी न्यार तक फैले हुए हैं तथा दूसरी तरफ पश्चिम दिशा में महादेव मन्दिर के उपर ऐलौं की धार (जगह का नाम) से होते हुये डुंगरी गदने की तरफ गाँव के पुराने “स्यारे” (पानी वाले धान के खेत) हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की 1970-75 तक जब तक हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई कच्ची “कूल” (कृत्रिम नहर) से पानी आता था, ये खेत उपजाऊ थे परन्तु ऊसकी जगह सरकारी पक्की कूल बनने से पानी का आना बंद हो गया और आजकल ये स्यारे सरकारी उदासीनता के कारण बंजर पड़े हुये हैं। हमें अच्छी तरह से याद है कि जब इस कच्ची कूल का पानी ऊपर से झरने के रूप में नीचे गिरता था और सारा गाँव धान की रोपाई करता था तो उस मनोरम दृश्य का आनन्द ही अलग था। इन्हीं स्यारों के ठीक नीचे एक अंत्यन्त प्राचीन
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“घट” (पानी से चलने वाली पनचक्की) है। अब इस घट का प्रयोग नही होता परन्तु जब पहले रात में यह चला करता था तब उसकी ध्वनी पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती थी। यह “ घट ” आज भी वैसा ही है जैसे पहले था। आज हम अपनी मातृभूमि के प्रति उदासीन हो गये हैं अन्यथा इस प्राचीन “घट” का उपयोग हम बिजली बनाने के लिये कर सकते थे। गाँव के ठीक ऊपर उत्तर दिशा में “माँ काली का मन्दिर” है और इसी के पास गाँव से थोड़ा ऊपर हमारे पूर्वजों की
“पितृकुटी” है, जहाँ उनके “स्मृति चिन्ह” रखे जाते हैं। गाँव के पूर्व दिशा में “नांदा गाँव” है और इन दोनों के बीच में गाँव की प्राथमिक पाठशाला है। पाठशाला के नजदीक ही हमारे “हीत देवता” ,
“नागर्जा देवता” एंव
“उफरांई देवता” के प्राचीन मन्दिर हैं। तथा बड़े-बड़े खेत हैं जो कि नांदा गाँव तक फैले हुये हैं। |