चार धाम यात्रा
श्रद्घालु और धर्म प्रेमी सदियों से दिव्य ज्ञान की खोज में गढ़वाल के चार धाम श्री गंगोत्री, श्री यमुनोत्री, श्री केदारनाथ व श्री बद्रीनाथ की दुर्गम यात्रा करते रहे हैं। चिरंतनकाल से यह चार धाम मनोरम, आस्था और प्रेरणा के अखण्ड स्त्रोत रहे है। इनकी यात्रा और परिक्रमा पुराणों में सर्वश्रेष्ट कर्म के रूप में वर्णित है। पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन को पापमुक्त करने के लिए गंगा जी ने नदी के रूप में प्रकट होकर धरती को कृतार्थ किया था। चार धामों में गंगा के कइ रूप और नाम हैं। जैसे गंगोत्री में भागीरथी, केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। परम्परा के अनुसार चार धाम की यात्रा पशिचम से पूर्व दिशा की ओर होती है, इसलिए यह यात्रा यमुनोत्री से प्रारम्भ होकर गंगोत्री, केदारनाथ के पश्चात बद्रीनाथ में जाकर संपन्न होती है।
यमुनोत्रीः
गढ़वाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यमुना पावन नदी का स्त्रोत कालिंदी पर्वत है। तीर्थ स्थल से एक कि. मी. दूर यह स्थल 4421 मी. ऊँचाई पर स्थित है। दुर्गम चढ़ाई होने के कारण श्रद्धालू इस उद्गम स्थल को देखने से वंचित रह जाते हैं। यमुनोत्री का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनी का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। भूकम्प से एक बार इसका विध्वंस हो चुका है, जिसका पुर्ननिर्माण कराया गया। यहाँ पर श्रधालु अविभूत हो जाते हैं और अपनी सारी थकान को भूल जाते हैं।
सूर्यकुण्ड गरम पानी के मुख्य स्त्रोतों में से एक है जिसका तापमान भी काफी अधिक होता है। श्रधालु कपड़े में चावल या आलू बाँधकर इस कुण्ड में डालते है जो थोड़ी देर में पक कर उपर आ जाते है इसी का भोग मंदिर मे लगता है और यही यहाँ का प्रसाद भी है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिशर 3235 मी. उँचाई पर स्थित है। यँहा भी मई से अक्टूबर तक श्रद्धालुओं का अपार समूह हरवक्त देखा जाता है। शीतकाल मे यह स्थान पूर्णरूप से हिमाछादित रहता है। मोटर मार्ग का अंतिम विदुं हनुमान चट्टी है जिसकी ऋषिकेश से कुल दूरी 200 कि. मी. के आसपास है। हनुमान चट्टी से मंदिर तक 14 कि. मी. पैदल ही चलना होता था किन्तु अब हलके वाहनों से जानकीचट्टी तक पहुँचा जा सकता है जहाँ से मंदिर मात्र 5 कि. मी. दूर रह जाता है।
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गंगोत्री
हिमालय की गोद उत्तरकाशी से 104 कि. मी. की दूरी पर स्थित यह तीर्थ स्थल श्रद्धालुऔं के लिए अति महत्वपूर्ण है। मान्यता यह है कि इसी स्थान पर अवतरित होकर माँ गंगा ने धरती माता को कृतार्थ किया था। यह स्थल समुद्रतल से 3140 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। युगों-युगों से मई से अक्टूबर तक लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं। शीतकाल में यह स्थल पूर्ण रूप से बर्फ से ढक जाता है। पुराणों में कहा है कि स्वर्ग की बेटी गंगा देवी ने गंगा का रूप लेकर राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्घार किया था। शताब्दियों की कड़ी तपस्या के बाद ही गंगा देवी ने भागीरथ की मनोकामना पूरी की थी। गंगा को इसी लिये भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है। भागीरथी के दाएँ तट पर गंगा देवी को समर्पित गंगोत्री मंदिर है। 18वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा इसका निर्माण हुवा था। भागीरथी या गंगा का मुख्य स्त्रोत गौमुख है जो गंगोत्री से 18 कि. मी. दूर पैदल यात्रा के रास्ते पर है। कई श्रद्धालु गौमुख को ही पूरी यात्रा मानते हुए वहाँ जाना आवश्यक समझते हैं और वहाँ पर स्नान कर अपने भाग्य को धन्य समझते हैं। जलमग्न शिवलिंग दिव्य शक्ति और आलौकिक आस्था का लजीव चित्रण है। पुराणों के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था। पूर्ण शिवलिंग केवल शीत ऋतु में ही दिखाई देता है जब पानी का स्तर कम हो जाता है।
गंगोत्री यात्रा मार्ग के कुछ विशेष स्थलः- हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेन्द्रनगर, कुञ्जापुरी, चम्बा, नई टिहरी, चिन्याल सौड़, धरासु, डुण्डा, उत्तरकाशी, मनेरी, भटवाड़ी, हर्षिल, भैरोघाटी आदि है।
केदारनाथ
भगवान शिव के 12 ज्योतिरलिगों में सबसे महत्वपूर्ण पर्वत-मण्डलों के मध्य एकचित ध्यान लीन केदारनाथ तीर्थ 3581 मी. की ऊँचाई पर मंदाकिनी के तट पर स्तिथ है। हिन्दु धर्म में केदारनाथ की आस्था और मान्यता का कोई पार नहीं है। इस पावन तीर्थ स्थल का उद़गम महाभारत के पृष्ठों में अंकित है। पौराणिक मीन्यतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रूद्रनाथ में मुख, पदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में पंचकेदार में शिव अर्चना की जाती है। 8 वीं सदी में आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पाण्डवों के प्राचीन मंदिर के समीप है। मंदिर की दीवारों पर देवताओं और पौराणिक गथाओं के चित्रण बड़े सजीव ढंग से अंकित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर नन्दी बैल की मूर्ती, पूजा के लिए गर्वगृह, श्रद्धालुओं और आगन्ततुकों के लिए मण्डप, यही केदारनाथ मंदिर का स्वरूप है। सर्दियों में केदारनाथ बर्फ से ढके होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है। मई से अक्टूवर के बीच केदारनाथ मंदिर के दर्शनों के लिये उपयुक्त समय है। आदिगुरू शंकाराचार्य की समाधि केदारनाथ मंदिर के पीछे है। जनश्रुति के अनुसार चार-धामों की स्थापना के पश्चात आदिगुरू शंकाराचार्य 32 वर्ष की आयु में यहाँ पर समाधिलीन हो गये।
पौराणिक मतानुसार पांडव ने कुरूक्षेत्र महायुद्ध के पश्चात हस्तिनापुर का राज्य, राजा परिक्षित को सौंप कर अपने परिजनों की मृत्यु का प्रायश्चित करने के लिए उत्तराखण्ड की ओर चल दिये। पर्वत-मण्डल के मध्य इस पावन स्थल पर पहुँचने के बाद पांडवों ने यहाँ पर केदारनाथ मंदिर की स्थापना की।
केदारनाथ मंदिर के प्रमुख देव शिव का सर्दियों का निवास उखीमठ है जो केदारनाथ के पुजारी (रावल) का स्थान भी है। ऋषिकेश से केदारनाथ 223 कि. मी. दूरी पर है। केदारनाथ के पावन दर्शनों के लिए 14 कि. मी. की पद-यात्रा गौरीकुण्ड से आरंभ होती है। यंहा के मुख्य आकर्षक गौरी देवी का मंदिर और गर्म पानी के कुंड हैं। हरे भरे जंगलों के बीच मनमोहक प्राकृतिक दृष्य के अलौकिक आनन्द के साथ श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं, चार-पांच कि. मी. के बाद चट्टीयाँ आती हैं जहाँ पर खाने-पीने की चीजें उपलब्ध होती हैं। जब तीर्थयात्री पहाड़ से निकलते झरनों का अद्भुत दृश्य देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वास्तव में हम स्वर्ग में पहुँच गये हैं। अंत में गरूड़ चटटी आती है जहाँ से केदारनाथ मंदिर के पीछे की बर्फीली श्रृखलाएं नजर आने लगती हैं और अपनी मंजील तक पहुंचने का सुख प्राप्त होता है।
पंच केदार
श्री केदारनाथः यह सोन प्रयाग से 19 कि.मी. की दुरी पर स्थित है।
श्री तुंगनाथः गोपेश्वर से 19 कि. मी. की दूरी पर तुगंनाथ का मन्दिर है। इसके निकट आकाश गंगा नामक श्रोत है। तुंगनाथ शिखर तीन जलधाराओं का उद्गम स्थल है।
मद महेश्वरः माला चट्टी से 25 कि. मी. की दूरी पर मद महेश्वर महादेव का मन्दिर है। चौखम्भा की तलहटी पर 3289 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह एक अद्वितीय मन्दिर है। यहां के जल की कुछ बूदें ही मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयाप्त मानी जाती है।
कल्पेश्वरः हेलंग से 9 कि. मी. की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव का मन्दिर है। यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। ऋषि अधर्य ने यहां पर कठिन तपस्या करके सुप्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी का सृजन किया था।
रूद्रनाथः मण्डल चट्टी से 24 कि.मी. की ऊंचाई पर भगवान रूद्रनाथ का मन्दिर है। अपने पूर्वजों के क्रिया-कर्म, तर्पण आदी तथा उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए धर्मावलंबी यहां आते हैं।
बद्रीनाथ (भगवान विष्णु का दरबार)
चारों धामों में सर्वश्रेष्ट हिन्दु धर्म का सबसे पावन तीर्थ, हर श्रद्धालु की मंजिल नर और नारायण पर्वत श्रंखलाओं से घिरा बद्रीनाथ, अलकनंदा नदी के बाऐँ तट पर नील कठं श्रृंखला की पृष्ट भूमि पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल बदरियाँ (जंगली बेरों) से भरा रहने के कारण इसको बद्री बन भी कहा जाता था।
3,133 मी. की उँचाई पर स्तिथ बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को अर्पित है। 15 मी. की उँचे इस मंदिर का निर्माण 8वीं सदी के बद्धिजीवी संत आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा किया गया था। यह मंदिर बर्फीले तुफानों के कारण कई बार क्षति ग्रस्थ हुआ और पुनः निर्मित किया गया है। सजीव सिंहद्वार इस प्राचीन मंदिर को एक नवीन छवि प्रदान करता है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है। दाहीने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियाँ है। आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा यंहा एक मठ की भी स्थापना की गई थी।
पंच बद्री
केदारखण्ड स्तिथ श्री बद्रीनाथ के सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराघ्य देव श्री बद्रीनाथ के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। नारायण के पाचों रूपों की पांच बद्रीयाँ निम्न प्रकार से है। वीशाल बद्री के नाम से बद्रीनाथ, पंच बद्रीयों में से एक है। बद्रीनाथ का श्रद्धेय मंदिर पौराणिक गाथाऔं, कथनों और घटनाऔं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। स्वर्ग, धरती और पाताल में तीर्थ स्थल है लेकिन बद्रीनाथ जैसा न कोई है न कोई होगा। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुःखों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। अतः गंगा की धारा बारह जल मार्गों में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। आदिगुरू शंकाराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूवर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिये खुला रहता है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 कि.मी., कोटद्वार से 327 कि.मी. तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविघाजनक मार्गों से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रह्मकपाल, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां अन्य दर्शनीय स्थल हैं।
विशाल बद्रीः (श्री बद्रीनाथ में) श्री बद्रीनाथ की देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यहीं कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात एक नारद शिला के निचे मूर्ति के रूप में बद्रीनारायण मिले। जिन्हें बद्री विशाल के नाम से जाना जाता है।
श्री योगध्यान बद्रीः (पाण्डुकेश्वर में) जोशीमठ तथा पीपलकोटी पर ध्यान बद्री का मन्दिर स्थित है। कौरवों से विजय प्राप्त कर, भय के कारण पांडव हिमालय की तरफ आये और यहां उन्होंने राजा परीक्षित को अपनी राजधानी हस्तिनापुर सौंप दी तथा स्वर्गरोहण से पूर्व यंहा घोर तपस्या की।
भविष्य बद्रीः (सुनाई जोशीमठ के पास) जोशीमठ से 15 कि.मी. की दूरी पर भविष्य बद्री का मन्दिर स्थित है। आदी ग्रन्थों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
वृद्ध बद्रीः (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब मनुष्य ने कलयुग में प्रवेश किया तो भगवान विष्णु मन्दिर में चले गये। यह मन्दिर वर्ष भर खुला रहता है।
आदी बद्रीः कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि. मी. दूर स्थित है। यहां 16 छोटे मन्दिरों का समूह है। ऐसा विशवास है कि इन मन्दिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदीशंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शों के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत् थे।
पचं प्रयाग
जिस प्रकार प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना तथा सरस्वती के दर्शन होते हैं, उसी प्रकार उत्तराखण्ड में पंच प्रयाग के अलग-अलग दर्शन होते हैं। ये पंच प्रयाग मुख्य नदियों के संगमों पर स्थित हैं-
देव प्रयागः हरिद्वार से 93 कि. मी. की दूरी पर भागिरथी तथा अलकनंदा के संगम पर स्थित है। शिव मन्दिर और रघुनाथ मन्दिर यहाँ के मुख्य आकर्षण है। यहीं से भागिरथी नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। संगम पर गंगा की घारा के मध्य टीला डोण्डेश्वर प्रसिद्ध है।
रूद्र प्रयागः देव प्रयाग से 71 कि. मी. अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों के संगम पर स्थित है। यहाँ नारद जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। यहाँ पर चामुण्डा देवी व रूद्रनाथ मन्दिर दर्शनीय है।
कर्ण प्रयागः रूद्र प्रयाग से 31 कि. मी. की दूरी पर कर्ण प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा पिण्डर नदी का संगंम है। कहा जाता है कि कर्ण ने यहाँ पर कठोर तपस्या की थी। यहाँ उमा और कर्ण मन्दिर दर्शनीय है।
नन्द प्रयागः कर्ण प्रयाग से 21 कि. मी. की दूरी पर नन्द प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों का संगंम है। भगवान विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए नन्द वंश के राजा ने यहाँ तपस्या की थी। यहाँ गोपाल जी का मन्दिर दर्शनीय है।
विष्णु प्रयागः गंगा जी की सहायक नदी अलकनंदा नाम से प्रसिद्ध है। अलकनंदा एवं धौली गंगा के संगम को विष्णु प्रयाग कहते हैं। यहाँ भगवान विष्णु की प्रतिमा और विष्णुकुण्ड दर्शनीय है।