| उत्तराचंल की प्रमख नदियां
गंगा, यमुना, काली, रामगंगा, भागीरथी, अलकनन्दा, कोसी, गोमती, टौंस, मंदाकिनी, धौली गंगा, गौरीगंगा, पिंडर नयार(पू) पिंडर नयार (प) आदी प्रमुख नदीयां हैं।
उत्तराचंल के प्रमुख हिमशिखर
गंगोत्री (6614), दूनगिरि (7066), बंदरपूछ (6315), केदारनाथ (6490), चौखंवा (7138), कामेत (7756), सतोपंथ (7075), नीलकंठ (5696), नंदा देवी (7817), गोरी पर्वत (6250), हाथी पर्वत (6727), नंदा धुंटी (6309), नंदा कोट (6861) देव वन (6853), माना (7273), मृगथनी (6855), पंचाचूली (6905), गुनी (6179), यूंगटागट (6945)।
उत्तराचंल के प्रमुख ग्लेशियर
1. गंगोत्री 2. यमुनोत्री 3. पिण्डर 4. खतलिगं 5. मिलम 6. जौलिंकांग, 7. सुन्दर ढूंगा इत्यादि।
उत्तराचंल की प्रमुख झीलें (ताल)
गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नंदीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल (कुंमाऊँ क्षेत्र) इत्यादि।
उत्तराचंल के प्रमुख दर्रे
बरास- 5365मी.,(उत्तरकाशी), माणा- 6608मी. (चमोली), नोती-5300मी. (चमोली), बोल्छाधुरा-5353मी.,(पिथौरागड़), कुरंगी-वुरंगी-5564 मी.( पिथौरागड़), लोवेपुरा-5564मी. (पिथौरागड़), लमप्याधुरा-5553 मी. (पिथौरागड़), लिपुलेश-5129 मी. (पिथौरागड़), उंटाबुरा, थांगला, ट्रेलपास, मलारीपास, रालमपास, सोग चोग ला पुलिग ला, तुनजुनला, मरहीला, चिरीचुन दर्रा।
उत्तराचंल के वन अभ्यारण्य
1. गोविन्द वन जीव विहार 2. केदारनाथ वन्य जीव विहार 3. अस्कोट जीव विहार 4. सोना नदी वन्य जीव विहार 5. विनसर वन्य जीव विहार
उत्तराखण्ड के लोक गीतः
गीत और संगीत उत्तराखण्ड संस्कृति का अनादिकाल से महत्तवपूर्ण अंग रहा है। हर मौकों पर गीत गाए जाते हैं। यहाँ तक कि जब पर्वतीय महिलाएँ घास काटने जंगलों में जाती हैं वहां भी लोकगीत गाये या गुनगुनाए जाते हैं। कुछ लोक गीतों का विवरण इस प्रकार हैः-
मांगलः- यह गीत शभ कार्यों एंव शादी विवाह के मौकपर गाये जाते हैं।
जागरः- जागर देवताओं के गीत है जैसे- विनसर, नागर्जा, नरसिंह, भैरों, ऐड़ी, आछरी, जीतू, लाटू, भगवती, चण्डिका, गालू देवता आदी।
पंडोवः - पंडोव गढ़वाली लोक साहित्य के मौलिक महाकाव्य तथा खण्ड काव्य है। इन गीतों में ठाकुरी राजाओं के वीर गाथाओं को गाया जाता है। जैसे तीलूरोतेली, जोतरमाला, पत्थरमाला, नौरंगी, राजुला, राजा, जिते सिंह आदी।
चौफुलाः - यह नृत्य चांदनी रात में गोल दायरे में घूमकर पुरूष तथा महिलाएं मिलकर गाते हैं। इसमें प्रकृति तथा उत्सवों के गीत गाये जाते हैं। यह नृत्य काफी कुछ गुजरात के “ गरबा ” नृत्य से मिलता है।
खुदेड़ गीतः - करूणात्मक शैली के गीत “खुदेड़” हैं। यह गीत माँ-बाप, भाई-बहन, सखी, वन, पशु-पक्षी, नदी, फल-फलों की स्मृति ताजा कराते है और इनकी याद आ जाने पर सबसे मिलने की चाह पैदा हो जाती है तथा न मिल पाने की स्थिति में ये गीत मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
चौमासाः - वर्षा ऋतु में हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड का सौंदर्य निराला होता है। इस ऋतु के दिनों में अक्सर परदेश में गये साथी की ज्यादा याद सताती है तब यह गीत अपने आप मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
थड़याँ - यह नृत्य बसंत पंचमी से लेकर विषुवत सक्रान्ति तक नेक सामाजिक व देवताओं के नृत्य गीतों के साथ खुले मैदान में गोलाकार होकर स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
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