पर्यटन
उत्तरांचल सदियों से अपनी ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, धार्मिक तथा नैसर्गिक विशिष्टताओं के कारण तीर्थयात्रियों एवं पर्यटन के आर्कषक का केन्द्र रहा है। उत्तरांचल अपनी प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ अपने अलौकिक कलाओं के लिए विख्यात है। भारत वर्ष में 27 वें राज्य उत्तरांचल (अब उत्तराखण्ड) का पूर्वी भाग कुमांऊ एवं पश्चिमी भाग गढ़वाल के नाम से जाना जाता है। यह संपूर्ण क्षेत्र एक वीशष्ट भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहचान बनाते हुए सम्पूर्ण हिमालय में अपनी एक अलग इकाई बना जाता है। भारतीय संस्कृति के उन्नयन में इस अँचल का विशेष योगदान रहा है। यहीं से गंगा जमुना का जन्म हुआ , देश को गंगा संस्कृति मिली। स्वर्ग का मार्ग यहीं के पर्वत श्रेष्ठ शुमेरू शिखर से जाता है। यही गढ़वाल हिमालय है जिसके दुर्गम मार्गों से पांडव स्वर्ग की ओर बढ़े थे। यही वह गढ़वाल हिमालय है जिसकि भव्यता देख कर स्वयं श्री कृष्ण भगवान ने अपने को गीता में हिमालय के रूप में व्याख्ययित किया था। जलप्लावन के पश्चात मनु द्वारा सृष्टि की रचना इसी भू-भाग पर हुई। देव-दानवों की उत्पत्ति स्थान भी इसी क्षेत्र को माना गया। आदि काल से देव , नाग , यक्ष , गन्धर्व , किन्नर और अनेक तत्वदर्शी मुनियों के इस क्षेत्र में वास करने के कारण इसे देवभूमि कहा गया है। वर्तमान में उत्तरांचल की भूमि, पौराणिक काल में केदारखण्ड और मानसखण्ड के नाम से जानी जाती थी आज वहीं गढ़वाल एवं कुमांऊ मंडल कहे जाते हैं। उत्तरांचल में तीर्थटन की विपुल संभावनाए हैं। आज आवश्यकता है इनके विकास एवं प्रचार की। उत्तरांचल के 13 जिलों में निहित पर्यटन एवं तीर्थटन को ध्यान में रखते हुए उनके ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक पृष्टभूमि पर निम्न जानकारी दी जा रही है।
फूलों की धाटी-
यह स्थान बद्रीनाथ से लगभग 42 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। पुष्पा नदी की धारा के समीप एवं रतनवन हिमशिखर क्षेत्र में स्थित इस विशव प्रसिद्ध फूलों की घाटी को सर्वप्रथम प्रसिद्ध पर्वतारोही फ्रेंक एस. स्मिथ ने सन् 1931 में कामेट शिखर के पर्वतारोहण के दौरान देखा एवं विस्तृत पुष्प उद्यान में उन्होंने अनगिनत फूलों का संकलन किया और फूलों की धाटी पर एक पुस्तक भी लिखी। यह घाटी गोविन्द घाट से 19 कि. मी. पैदल दूरी पर है। घाटी में फूलों के खिलने का समय जुलाई-अगस्त महीने में है। चमोली उत्तराचंल के समस्त शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। यह स्थान ऋषिकेश से लगभग 204 कि. मी. की दूरी पर है।
पाताल भुवनेश्वर का गुफा मंदिर-
कुमाऊ आँचल की पिथौरागढ़ क्षेत्र अपना एक अलग महत्व रखता है। पिथौरागढ़ जनपद के गंगालीहाट क्षेत्र में महाकाली मंदिर, चामुंडा मंदिर, गुफा मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह प्राचीन शिव गुफा मंदिर धरती के अंदर 8 से 10 फीट गहरी गुफा के अंदर बना हुआ है। जिसमें तरह-तरह की मूर्तियां विद्यमान हैं। यह स्थान सरयु राम गंगा के बीच बसा हुआ है। जिसका मुख उत्तर दिशा है। मैदान से उतरने तक 84 सीढ़ियाँ है। पताल के प्रथम तल में शेषनाग हैं उसके ऊपर पूरी पृथ्वी टिकी हुई है। इस गुफा का प्रारम्भिक मुख द्वार बहुत संकरा है। जिसमें एक बार में एक व्यक्ति ही बड़ी मुश्किल से नीचे उतर पाता है। नीचे उतरने के बाद गुफा के अंदर काफी बड़ा मैदान है। शिवरात्रि को यहां पर विशाल मेला लगता है। गुफा में दाहिनी ओर केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ की तीनों मूर्तियां विद्यमान हैं। यहां पर तीनों के दर्शन एक ही दृष्टि में होते हैं। उसी के साथ काल भैरव की जीभ है उनके गर्भ से प्रवेश करके उनकी पूंछ में त्रिमूर्ति है। लेकिन वहां तक मनुष्य अभी तक नहीं पहुंच पाया। पुराण के अनुसार कोई मनुष्य उस स्थान तक पहुंच जाए तो उसका अगला जन्म नहीं होता। गुफा के अंदर इसके बाद भगवान शंकर का मनोकामना झोला है। उसी साथ आसन है तथा काली कमली बीछी है और उसके नीचे बाधम्बर बिछा है वहीं पर पाताल भैरवी है जो मुण्डमाला पहने खड़ी हैं। यहां पर चार द्वार हैं 1) रण द्वार 2) पाप द्वार 3) धर्म द्वार और 4) मोक्ष द्वार। रण द्वार कलयुग में बंद हुआ, धर्म द्वार एवं मोक्ष द्वार खुले हुए हैं। अगर मनुष्य हर कार्य धर्म से कर रहा है तो उसके लिए मोक्ष में कोई रूकावट नहीं है। यहां पर मार्कन्डेश्वर ऋषि का आश्रम है। जहां पर मार्कण्ड ऋषि ने चार हजार वर्ष तक भगवान शंकर की तपस्या की थी, और यहीं पर मार्कन्डपुराण लिखा गया था। इसके साथ ही ब्रह्मा जी का पंचवा सिर है जिसे ब्रह्मकपाल कहा गया है। जिसमें उत्तर वाला सिर वह है जिस पर तर्पण करते हैं। यहां पर जीते जी श्राद्ध होता है। इससे आगे सप्तकुण्ड है जिसमें एक के बाद एक कुण्डों में पानी जमा होता है। पराणों में लिखा गया है कि उन कुण्डों में पानी के साथ अमृत बहता था। इस गुफा में 33 करोड़ देवताओं के बीच भगवान शिव का नर्मदेश्वर लिंग है जिस पर जितना भी पानी पड़ता है वह उसे सोख लेता है। इसके बाद आकाश गंगा है जिस पर बहुत लम्बी तारों की कतार है। इसके साथ ही सप्त ऋषि मंडल है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि भगवान शंकर कैलाश में सिर्फ तपस्या करते थे। उनके समय बिताने के लिए विष्णुजी ने उनके लिये यह स्थान चुना। पाण्डवों के एक वर्ष के प्रवास के दौरान का दृश्य, उनके द्वारा जुए में हारना, सतयुग से कलयुग आने का चित्रण व कई प्राचीन शिल्प कला के दृष्य देखने को मिलते हैं। यह एक धार्मिक स्थल के साथ ही रोमांचक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है। यहां पर मनुष्य प्रवेश वर्जित था परन्तु कलयुग में आदी गुरू शंकराचार्य जिन्हें शंकर का अवतार माना जाता है, के द्वारा ही मनुष्य के लिए खोला गया। ऐसा मानना है कि इस गुफा में दर्शन करने से चार धाम यात्रा के दर्शन के बराबर फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह शिव गुफा सतयुग के समय की है। इस प्राचीन शिव मंदिर गंगोहीहाट पहुंचने के लिए हल्द्वानी से सीधी बस सेवा है, अपने वाहन व जीप द्वारा भी अल्मोड़ा से श्री जगेश्वर होते हुए भेराघाट से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
औली-
यह स्कीइंग का (बर्फ पर फिसलना) का विशव प्रसिद्ध केन्द्र है जो जोशीमठ से 16 कि.मी. दूर सड़क मार्ग पर स्थित है। औली की स्कीइंग ग्राऊण्ड विशव में प्रसिद्ध स्कीइंग ग्राउण्ड में से एक है। यह चमोली जिले के जोशीमठ के पास स्थित है। रोमांच से भरे स्नो स्केटिंग के लिए विशवभर से पर्यटक यहाँ प्रतिवर्ष आते हैं। स्कीइंग ग्राउण्ड की लम्बाई और चौड़ाई लगभग 3 कि. मी. की है। जोशीमठ से 16 कि.मी. की दूरी पर बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित औली न केवल स्केटिंग के लिए प्रसिद्ध है बल्कि यहां से नन्दा देवी कामेट, दूना गिरि की विशाल पर्वत श्रंखलाऐं मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। औली में प्रतिवर्ष हिमक्रीड़ा का आयोजन किया जाता है। गर्मियों में यहां की हरी घास का दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो हरी चादर बिछा रखी हो तथा सर्दियों में तीन-तीन मीटर बर्फ की चादर से ढ़का यह ढलानदार औली बुग्याल, गढ़वालमण्डल विकास निगम द्वारा पर्यटकों की हीमक्रिड़ा करने के लिए सभी सुविधायें उपलब्ध कराता है। औली पर्यटन प्रेमियों के लिए स्वर्ग के समान है।
हेमकुण्ड साहिब-
सिख धर्म की आस्था का प्रतीक हेमकुण्ड साहीब का पावन गुरूद्वारा समुद्र तल से 4329 मी. की ऊँचाई पर एक झील के किनारे स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि यहां पहले एक मंदिर था जिसका निर्माण भगवान राम के अनुज लक्ष्मण ने करवाया था। सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह ने यहां पूजा अर्चना की थी। बाद में इसे गुरूद्वारा धोषित कर दिया गया। इस दर्शनीय तीर्थ में चारों ओर से बर्फ की ऊँची चोटियों का प्रतिबिम्ब विशालकाय झील में अत्यन्त मनोरम एवं रोमांच से परिपूर्ण लगता है। इसी झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत श्रृंखलाओं से पानी आता है। एक छोटी जलधारा इस झील से निकलती है जिसे हिमगंगा कहते हैं। झील के किनारे स्थित लक्ष्मण मंदीर भी अत्यन्त दर्शनीय है। अत्यधिक ऊँचाई पर होने के कारण साल में लगभग 7 महीने यंहा झील बर्फ में जम जाती है। फूलों की धाटी यहां का नजदीकी पर्यटन स्थल है।
मिलम ग्लेशियर-
पिथौरागढ़ से मिलम ग्लेशियर की दूरी 213 कि.मी. है। मिलम ग्लेशियर से ही गैरी नदी का उद्गगम् होता है। मिलम ग्लेशियर 3488 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। मिलम ग्लेशियर जाने का ट्रैक मुंश्यारी से शुरू किया जा सकता है। मुंश्यारी के लिए नैनीताल होकर या पिथौरागढ़ होकर जाया जा सकता है। मुंश्यारी में एक बड़ा रेस्ट हाऊस तथा कई छोटे-मोटे लॉज हैं। मुंश्यारी से लिलाम-बागुडिर- भारतोली मिलाम गांव होते हुए ग्लेशियर तक पदयात्रा की जा सकती है। कुल दूरी लगभग 52 कि.मी. है। यह क्षेत्र विकट एवम् रोमांचकारी है। मुंश्यारी से ही पदारोहीयों को सारी व्यवस्था करनी होती है। नामिक ग्लेशियर 3000 मी. एवम् रालम ग्लेशियर को जाने वाले पदारोही भी मुंश्यारी से ही अपनी व्यवस्था करते हैं। आदी कैलाश धारचूला पिथौरागढ़ से 20 दिन की यात्रा उपरान्त आदि कैलाश पहुँचा जाता है। धारचूला कैलाश मानसरोवर यात्रा का भी मुख्य पड़ाव है।