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स्व. राधवानन्द जी के प्रथम पुत्र स्व. वासवानन्द बहुगुणा जी का जनम 2 जून, 1910 तथा स्वर्गवास 31 जनवरी 1976 को अपने ग्राम ओडली में हुआ। इनकी गणना अपने समय के महान शास्त्रीयों में होती थी। इन्होंने शास्त्री परीक्षा सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय, लाहौर से उतीर्ण की। ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड की शिक्षा इन्होंने अपने पिता से तथा स्वाध्याय से प्राप्त किया। भागवत पुराण कहना भी उन्हैं बहुत प्रिय था। ज्योतिष में गणित के प्रति इनकी अधिक रूचि थी। |
ओडली निवासी स्व. राधवानन्द जी की दूसरी संतान केशवानन्द जी (अच्युतानन्दजी से अठारहवीं पीढी में) का जन्म 31 मार्च, 1915 ई0 को ओडली गाँव में एवं स्वर्गवास कलकत्ता में हुआ था। वास्तविक शिक्षा इन्होंने जीवन संघर्ष से प्राप्त की। परिश्रमी, सत्यनिष्ठ, विनम्र एवं व्यवारिक होने के कारण व्यपार में पर्याप्त उन्नति की। 1942 में इन्होंने कलकत्ता में कोटोलिना नाम से डिपार्टमेँण्टल स्टोर खोला। व्यपार में समृद्धि तथा व्यवस्तता होने पर भी अपने लोगों से इनका आत्मीय सम्बन्ध बना रहता था। |
श्री बलदेव राज जी के दुसरे पुत्र श्री मित्रानन्द बहुगुणा जी अपने समय के प्रसिद्ध वैद्य थे। ये स्थानीय जड़ी बूटियों द्वारा विशिष्ट औषधियों का निर्माण कर असाध्य रोगों का उपचार करते थे। इसके अलावा इनके पास शारंगधर पद्धति के अलावा पर्याप्त भैषजिय जानकारी व अनुभव था जिससे असाध्य रोगों से पिड़ीत कई रोगियों को इन्होंने नव-जीवन दिया। ये फोडों का “ ततार ” (लाल गर्म सलाख से छेदना), तथा वात रोगों से उत्पन्न दर्दों का “ टकोरे ” से और तिताले से उपचार करने में सिद्ध हस्त थे। ये लौह भस्म, शंख भस्म के अलावा पारे, अभ्रक आदि की शोधन विधि भी जानते थे। ये सैकड़ों जड़ी बूटियाँ का उपयोग करना जानते थे। तीव्र ज्वरों में स्वनिर्मित चूर्ण एवं बर्सिंगो तथा किनगोड़े का उपयोग अपनी औषधियों में करते थे। |